Trending News : आज ही के दिन विजय दिवस पर इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के 93 हज़ार सैनिकों को रिहा कर दिया था

आज 16 दिसंबर है, वो दिन जब भारत अपने सैनिकों के शौर्य को याद कर हर साल विजय दिवस मनाता है। इसी दिन भारत ने 1971 की जंग में पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इस अवसर पर हम उन वीरों को याद करने जा रहे हैं, जिन्हें ‘द मिसिंग 54’ के नाम से जाना जाता है। ये वो भारतीय जवान हैं, जिन्हें सरकारों द्वारा भुला दिया गया है। हालांकि जब भी पाकिस्तान और भारत की जंग का जिक्र होता है, तब ये सैनिक एक टीस बनकर देशवासियों के जहन में आ जाते हैं।

भारत और पाकिस्तान के 1971 में बांग्लादेश को आज़ाद कराने को लेकर युद्ध हुआ, 13 दिनों तक चली लड़ाई में पाकिस्तान को करारी शिकस्त मिली। भारत का ऐसा मानना रहा है कि इस लड़ाई के दौरान जो 54 भारतीय जवान लापता हुए थे, उन्हें पाकिस्तान ने कैद करके अपनी जेल में रख लिया था।  इन 54 सैनिकों में 30 थल सेना के सौनिक और 24 वायु सेना के सैनिक थे। इस युद्ध में भारत ने भी पाकिस्तान के 93 हज़ार सैनिकों को बंदी बनाया था, लेकिन तत्कालीन पीएम इंदिरा गाँधी ने उन्हें छोड़ दिया था। मगर इंदिरा गांधी ने भारत के 54 सैनिक वापस नहीं मांगे। हालांकि, उन्होंने ऐसा क्यों किया, इस बात का जवाब आज तक नहीं मिला।

2019 में मोदी सरकार ने संसद में जानकारी दी थी कि ‘मिसिंग 54’ समेत 83 भारतीय सैनिक पाकिस्तान की जेलों में कैद हैं। ऐसा संभव है कि बाकी के सैनिक या तो बॉर्डर पर भटक गए हों या फिर कथित जासूसी के आरोप में जेल में डाल दिए गए हों। हालांकि पाकिस्तान किसी भी भारतीय युद्धबंदियों को रखने की बात को खारिज करता रहा है। लेकिन एक बात और समझ से परे है कि भारत सरकार ने 1990 के दशक की शुरुआत में एक स्थानीय अदालत में याचिका के जवाब में दो शपथपत्र दाखिल कर विचित्र रूप से “स्वीकार” क्यों किया कि मिसिंग 54 में से 15 को “मारे जाने की पुष्टि” की गई थी? और यदि ऐसा है, तो सरकार आज यह बात क्यों कह रही है कि सभी 54 सैनिक अब भी लापता हैं?

लापता सैनिकों में से एक के भाई ने बताया कि तत्कालीन भारत सरकार अपने काम में नाकाम रही है। उन्होंने कहा कि, ‘युद्ध की जीत में हम इन जवानों को भूल ही गए। मैं निरंतर सरकारों और रक्षा प्रतिष्ठानों को उनकी पूर्ण उदासीनता के लिए दोषी ठहराता हूं। हम चाहते थे कि कोई तीसरा पक्ष इस मामले में मध्यस्थता करे और इन सैनिकों के बारे में सच्चाई तक पहुंचे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ।’