मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण के खिलाफ दाखिल याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई

प्रयागराज. मथुरा-वृंदावन में आवासीय क्षेत्र में कॉमर्शियल गतिविधि के खिलाफ दाखिल याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. जिसमें हाईकोर्ट ने मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष व नगर आयुक्त नगर निगम मथुरा से जवाब मांगा है. मथुरा-वृंदावन में मास्टर प्लान के विपरीत आवासीय क्षेत्र में कॉमर्शियल गतिविधियों का आरोप लगाया है. प्रह्लाद कृष्ण शुक्ल की ओर से दाखिल जनहित याचिका दाखिल की गई है. 21 जुलाई को मामले की अगली सुनवाई होगी. चीफ जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने आदेश दिया. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मथुरा-वृंदावन में मास्टर प्लान के विपरीत आवासीय क्षेत्र में कामर्शियल गतिविधियों के विरुद्ध दाखिल याचिका पर मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष व नगर आयुक्त नगर निगम मथुरा से जवाब मांगा है.

अधिवक्ता प्रेमचंद्र पांडेय ने बहस की। याचिका में कहा गया है कि मथुरा वृंदावन में आवासीय क्षेत्र में निर्धारित मास्टर प्लान के विपरीत बड़े पैमाने पर कामर्शियल गतिविधियां संचालित की जा रही हैं. अनियोजित मनमाने विकास के कारण वृंदावन का प्राचीन स्वरूप प्रभावित हो रहा है. इससे यहां के नैसर्गिक पर्यावरण को भी बड़ी क्षति पहुंच रही है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीएसी कांस्टेबल से नियुक्ति के डेढ़ वर्ष के भीतर इस्तीफा देने पर कमांडेंट द्वारा प्रशिक्षण खर्च व मिले वेतन की वसूली आदेश के तहत उत्पीडऩात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है. राज्य सरकार से याचिका पर चार सप्ताह में जवाब मांगा है. याचिका की सुनवाई 25 जुलाई को होगी. यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव जोशी ने मेरठ पीएसी कांस्टेबल कमल प्रकाश की याचिका पर दिया है. याचिका पर अधिवक्ता ऋतेश श्रीवास्तव ने बहस की. याचिका के अनुसार याची का पीएसी कांस्टेबल पद पर चयन हुआ. उसे प्रशिक्षण पर भेजा गया. प्रशिक्षण पूरा होने के बाद 31 जुलाई 2020 को तैनात किया गया. नौ दिसंबर 2021 को उसने इस्तीफा दे दिया. कमांडेंट पीएसी मेरठ ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. उलटे प्रशिक्षण खर्च व वेतन की वसूली का आदेश जारी कर दिया. याची का कहना है कि नियमानुसार नियुक्ति के एक वर्ष के भीतर इस्तीफा देने पर वेतन व खर्च वसूली की जाएगी, लेकिन याची ने एक वर्ष बीतने के बाद इस्तीफा दिया है. इसलिए वसूली अवैध है.